मेरे ससुराल की मुगलिया सल्तनत

By Waheeda Khan

नई-नई शादी हुई और मैं ससुराल पहुँची। जैसे हर नई दुल्हन होती है—थोड़ी शर्माती है, कम बोलती है, ज़्यादा सुनती है और आसपास के लोगों को जानने-समझने की कोशिश करती है। मैं भी इसी प्रयास में लगी थी।

लेकिन यहाँ आकर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने ससुराल में नहीं, बल्कि सीधे मुगल सल्तनत में आ पहुँची हूँ।

मैंने सोचा—देखूँ तो सही, इस मुगलिया सल्तनत में कौन-कौन विराजमान है!

सबसे पहले मुलाकात हुई मुमताज़ से।

हम सब जानते हैं कि मुमताज़ महल शाहजहाँ की बेगम थीं। वही मुमताज़, जिनकी याद में शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया—मोहब्बत की वह निशानी, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आज भी हिंदुस्तान आते हैं।

लेकिन मेरे ससुराल में मुमताज़ किसका नाम था, पता है?

जी हाँ—मेरी सास का नहीं, मेरे ससुर का!

मेरे ससुर का नाम था—मुमताज़।

अब मुमताज़ शब्द का अर्थ भी बड़ा शानदार है—श्रेष्ठ, विशिष्ट, उत्कृष्ट, यानी सबसे अलग और खास। इसलिए मुमताज़ केवल स्त्री का नाम हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। पुरुषों का भी यह नाम हो सकता है।

बस, मुमताज़ महल के नाम से यह इतना मशहूर हो गया कि मुमताज़ सुनते ही हमारे दिमाग में एक बेगम की तस्वीर बनने लगती है।

खैर, ससुर का नाम तो हमने जान लिया—मुमताज़।

अब बारी थी सास की।

और सास का नाम सुनकर तो मुझे लगा कि शायद मेरी शादी नहीं, मुगलिया सल्तनत में मेरा राज्याभिषेक हुआ है!

मेरी सास का नाम था—नूरजहाँ!

इतिहास में नूरजहाँ, शाहजहाँ की नहीं, बल्कि शाहजहाँ के पिता जहाँगीर की बेगम थीं। वह मुगल दरबार की बेहद प्रभावशाली महिलाओं में से एक थीं और शासन तथा राजनीति में उनका काफी प्रभाव था।

मेरे ससुराल में भी कुछ ऐसा ही था।

यहाँ भी नूरजहाँ का सिक्का चलता था।

यूँ तो ज़्यादा बोलती नहीं थीं, लेकिन जो बोलती थीं, वह होता था। और मेरे ससुर—हमारे मुमताज़—उनके हर हुक्म की तामील करते थे।

चलिए, अब बढ़ते हैं अगले महत्वपूर्ण किरदार की तरफ़—मेरी ननद।

अब आप सोच रहे होंगे कि इनका नाम क्या होगा?

नाम सुनेंगे तो माथा पकड़ लेंगे।

इनका नाम था—शाहजहाँ!

जी हाँ—शाहजहाँ!

इतिहास में शाहजहाँ वही बादशाह थे, जिनकी बेगम थीं मुमताज़ और जिनके नाम से ताजमहल जुड़ा हुआ है।

लेकिन मेरे ससुराल में?

शाहजहाँ, मुमताज़ की बेटी थी!

लो कर लो बात!

ये कैसी मुगलिया सल्तनत चल रही थी यहाँ?

और हमारी शाहजहाँ भी उस ऐतिहासिक शाहजहाँ से कम नखरे वाली नहीं थीं। उनके अपने अलग नखरे थे और पूरे ससुराल में उनका भी अपना सिक्का चलता था। जो वह चाहती थीं, वही होता था।

इतिहास में शाहजहाँ, मुमताज़ के शौहर थे।

और मेरे ससुराल में शाहजहाँ, मुमताज़ की बेटी!

इतिहास में नूरजहाँ, जहाँगीर की बेगम थीं।

और मेरे ससुराल में नूरजहाँ, शाहजहाँ की माँ!

वाह! वाह! वाह!

इतिहास तो बेचारा यहाँ आकर अपना सिर पीट रहा था।

और जिसे कहते हैं उल्टी गंगा बहना, उसका अर्थ मैंने अपने ससुराल में सचमुच यथार्थ में देखा।

क्योंकि मेरा ससुराल था बनारस—गंगा नगरी।

तो यहाँ तो सचमुच उल्टी गंगा बह रही थी!

अब आते हैं इस मुगलिया सल्तनत के सबसे महत्वपूर्ण किरदार पर—मेरे पति।

उनका नाम सुनेंगे तो इस अजीबो-गरीब दास्तान में आप और भी चकरा जाएँगे।

जी हाँ—मेरे पति का नाम था सलीम।

इतिहास में शहज़ादा सलीम वही थे जो आगे चलकर मुगल बादशाह जहाँगीर बने। और जहाँगीर की बेगम थीं—नूरजहाँ।

लेकिन मेरे ससुराल में?

नूरजहाँ थीं सलीम की माँ!

और मुमताज़ थे सलीम के पिता!

यानी इतिहास में नूरजहाँ थीं सलीम की बेगम…

और मेरे ससुराल में नूरजहाँ थीं सलीम की माँ!

इतिहास में मुमताज़ थीं शाहजहाँ की बेगम…

और मेरे ससुराल में मुमताज़ थे शाहजहाँ के पिता!

इतिहास में शाहजहाँ थे मुमताज़ के शौहर…

और मेरे ससुराल में शाहजहाँ थी मुमताज़ की बेटी!

अब आप ही बताइए—

यह ससुराल था या मुगल इतिहास का ऐसा रीमेक, जिसमें रिश्ते वही रखे गए थे, बस रिश्तेदारों की जगह बदल दी गई थी!

इतिहास की पूरी वंशावली मेरे ससुराल के दरवाज़े पर आकर धराशायी हो चुकी थी।

और इस उल्टी-पुल्टी मुगलिया सल्तनत में मैं आ गई थी—अनारकली बनकर!

बस एक फर्क था।

इतिहास में अनारकली को सलीम के प्यार की सज़ा के तौर पर जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया था।

और इस आधुनिक अनारकली को?

सलीम से शादी करके चारदीवारी में बंद कर दिया गया था!

लेकिन इतिहास अपनी जगह है, ससुराल अपनी जगह।

मुगलिया सल्तनत की अनारकली अपनी जगह थी और यह modern अनारकली अपनी जगह।

आजकल की अनारकली को कौन दीवार में चुनवाएगा भला?

वह तो—

छोड़-छाड़ के अपने सलीम की गली, अनारकली डिस्को चली!

और बस, इसी तरह शुरू हुई इस आधुनिक अनारकली की मुगलिया ससुराल की कहानी—जहाँ इतिहास उल्टा था, गंगा उल्टी बह रही थी और रिश्ते अपनी ही शर्तों पर लिखे जा रहे थे…

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